Tuesday, April 11, 2006

आ मुझे रंग दे बसंती


I saw this movie some two months back..but still somehow it got deeply rooted inside me..i alwyas wanted to share my feelings bout it...well it took 2 months but still..now i can say..THE FIRE IS STILL BURNING........

आ मुझे रंग दे बसंती


कुछ कहानियां सच मं ज़िंदगी का रुख मोङ देती हैं
शांत स्थिर मन को किंकर्तव्यविमूढ छोङ देती हैं
एक ऐसी ही कहानी से मुलाकात हो गई
कहानी तो वही छूट गई पर भावनाएं साथ हो गई


ये कहानी है उन चंद स्तंभों की जिन्होने एक साथ
अतीत् और् वर्तमान् का रुख् मोड् दिआ
कर गए कुछ ऐसा कि अतीत और वर्तमान् को एक
मोङ पर ला कर छोङ दिआ..

भगत,चंद्रशेखर,राजगुरु,अश्फाक,दुर्गा...
आज से पहले ये आज़ादी के चेहरे हुआ करते थे..
आज चरित्र बन गए....
वो चरित्र जो आज़ादी के नये चेहरों को

चरितार्थ करते हैं
आज़ादी ज़िस्म की नही विचारों की होती है
इसे यथार्थ करते हैं.
क्योकि अगर ज़िस्म नपुंसक बन जाए
फिर भी दुनिया का गुज़ारा चल जाता है
लेकिन अगर विचार नपुंसक बन जाएं
तो आदमी अपने ही देश में गुलाम बन जाता है

उन चरित्रों का खून एक बार फिर चला
रंग दे बसंती के चोलों का लहू एक बार फिर बहा
लेकिन ये खून सिर्फ़ जिस्म तक कहां रहने वाला था
ये तो विचारों और पीढीयों को
अपने रंग में रंगने वाला था

मुझे नही पता उनका तरीका सही था या गलत
जानने की गर्ज़ भी नही है
क्योकि तरीकों से ज्यादा एहेमियत उसके पीछे
की मंशा की है
जिंदगी उसको समझ न पाए
इतनी भी खुदगर्ज नही है

शायद उन चरित्रों को यूहीं परदे पर मरना था
इसी तरह जंग लग चुकी इस पीढी को जगना था
हां,एक नया खून,एक नयी पीढी फिर से तैयार है
अपने विचारों की नयी जंग लडने को
और् एक बार फिर से कहने को
आ मुझे रंग दे बसंती.............

एक रात की कहानी

7-apr-06
NEEND jarurat se jyada aaye to bhi mushkil,na aaye to bhi...it was one of those sleepless nights..i was goin mad wantin to speak to one person,one friend in this world,but well,its not in every one's destiny to ve sleepless nights,bhagwan mere jaiso par hi meherban hota hai..
एक रात की कहानी
आज सारी रात मै सो न सका
आंख से आंसु तो छलके पर् रो न सका
क्योकि आंखे तो जरिय होती है
रोता तो ये दिल है
लेकिन दिल भी बेचारा सुकुन से रो ले
वो पल कहा हासिल है
कुछ मवाद सा भर गया है इस दिल मे
कुछ बीती हुइ बातों का
कुछ आधी अधूरी मुलाकातों का
कुछ मवाद उन सपनो का
जो मैने खुली आन्खो से देखे थे
कुछ उन जज्बातो का
जो आज रात मुझे घेरे थे
अंदर की आह अंदर ही बिलख गयी
बाहर की चीख बाहर ही निकल गयी
कहते है जब अंदर की आह और बाहर के चीख
एक साथ कराहती हैतभी दिल हल्का होता है,
नही तोवक़्त का कांटा पल पल चुभता है

ज़माना रात की गोद में अपनी थकान मिटा रहा था
मै अपनी ही धुन मे सडक पर चला जा रहा था..
सोचा, अपनी गली के नुक्कड पे जाके थोडा मन को बहला लूं
वैसे हो आदत नही पीने की,चाए(हुह),
लेकिन आजदो चुस्की लगा लूं..

रात के चार बजे भी सडक पर ज़िन्दगी
अपनी रफ़्तार से चल रही थी..
अगर कुछ रुका था तो मैं,पर मेरा शरीर नही
मुझसे ज्यादा खुश तो वो सडक के किनारे
सो रहा भिखारी था,चाहे वो अमिर नही
कम से कम उसे सही समय पर नींद तो आ जाती है
यहां तो ज़िन्दगी रुपय गिरवी रख,नींद उधार ले जाती है
थक गया हूं मां,तेरी आंचल कहां है
मै उसके तले सोना चाहता हूं..
मै बहुत खुश हो जाउंगा,
बस एक बारतेरी गोद मे सर रख के रोना चाहता हूं...

Monday, February 13, 2006

रिश्ते

चुपचाप रहो,गुमनाम रहो,इन रिश्तों से अंजान रहो
सपने तो आंखो का नीर हैं
बस यूहीं छलक जाते हैं
ना पलकों पर पलती इन बूंदों को
इस जीवन का अरमान कहो
सांसे भरो तो ऐसे भरो कि
सांसो को भी एहसास ना हो
जो कहना है वो कह डालो पर
होठों पर अल्फ़ाज़ न हो
उस साये के पीछे मत जाओ
जिसे लोग रिश्ते कहते हैं
रिश्तों का क्या भरोसा
पानी के बुलबुले हैं
बनते है बिगडते रहते हैं
इन रिश्तो के पीछे मत भागो
इन रिश्तो से बेईमान रहो
चुपचाप रहो,गुमनाम रहो,इन रिश्तों से अंजान रहो


ये घने बादलों के वो रिश्ते हैं
जो खुशियों पर बस छाएंगे
ये झोंके हैं उन्माद पवन के
जो जिस्म उठा सकते नही
बस सांसें लेकर जाएगे
जो सांसे लेना है टो ले जाओ
पर ना जिस्म को यूं बदनाम् करो
चुपचाप रहो,गुमनाम रहो,इन रिश्तों से अंजान रहो
सागर से आती लहरों से कभी
उम्मीद की आस मे मत रहना
बस छूकर चली जाएगी वो
पीने की प्यास में मत रहना
ये वो म्रिग त्रिष्णा है जो
भरे हुएनयनो से भी हंसाती है
पहले तो धङकन देती है फिर
सांसे लेकर जाती है
जो रिश्तो की लहर ने नही छुआ
तो कुदरत का एह्सान कहो
चुपचाप रहो,गुमनाम रहो,इन रिश्तों से अंजान रहो

Sunday, February 05, 2006

THE LOVE STORY OF ONE MID-NIGHT

It was not an usual night for me.It was a night when the power of speech succeded......It was a night when love was propagated not through eyes but through ears.May be she was playing a kind of word games with me but sometimes,it is pleasant to be a part of betrayal when you know that even a fake span of happiness is not going to kiss your destiny.Still, i dont know whether i name it the pinnacle of insanity or an ocean of pious emtions but whatever it was, i know one thing,it was nice to be a part of that.
Those days, i was a cyber freak who was a virtuoso when it comes to communicating behind the doors but in open corridor, a great fiasco.May be it was my impending feeling of not having even a single girl friend in thirteen years of my solitary journey(because only when i was 12 i came to know, what is a girl friend) which emblemed a tag in my heart that i cant communicate with girls.Well, it was not the same on messanger.I was the king there.May be i was the pennyless beggar who just got enough pennys to jingle and to feel to be at the zenith of affluence.One fine day,i met her in some chat room.I dont even remember our first encounter since it was not all that happening but still we shared some rapport and added each other.Life moved on and so my college life.I got a one month vacation during my pass out and my joining the job.Well,vacations are interesting in two cases.One,if you are to busy to get a day off or you are a part of a gang who likes to live their life before they become a part of the first community.But,none was the case with me.Infact,I think,regarding vacations, there is a third category who believes in the gospel of mahatma gandhi,to treat each day with same vision or better to say,who dont have vision for any of the seven days.you can call it a class of people for whom LIFE IS NOT HAPPENING.I, too, was a happening member of this non happening society.Thanks to the 21st century gadgets which gives some hope to this communityto rejoice the freshness of life.

Saturday, February 04, 2006

30th oct 1999

बहुत चीखा था मै,
इन दीवारों ने भी सुना मगर हाए
तुम न सुन पाए
आज जो चुप चाप बैठा हुं तो पूछती हो
ऐसे चुप चुप क्यों हो?

DONT GO BEHIND THIS SMILE

24th oct.1999


अपनी तङप को कैसे तुम्हें दिखाएं हम
रो पङे तो समझ लेना उदास हैं
हंस दें तो समझना ज़माने से मिले हैं हमें
हंसते ज़ख्म

AS A REPLY FOR SOMEONE

5th feb.2006
01.23AM

बङी नापाक है ये दुनिया
अपने प्रिये के कारण कभी तुम्हारा वजूद नही होता
दूसरों की बिसात कौन कहे
आदमी अपनी परछाइ से भी महफ़ूज नही होता

wanna smile

5feb2006
00.50AM

कभी मंजिलें खुद ब खुद मिल जाती है
क्योकि कुछ मंजिलों की रह गुज़र नही होती
कभी मुस्कुराने के बहाने मत खोजना
क्योकि हर मुस्कुराहट की कोइ वज़ह् नही होती...


.just wanna share one smile with all of you:-)

कल आज और कल

Inspiration: when i was in 6th std.i was crazy to geta new cycle n did not even looked over my childhood bicycle which once i loved so much..when grew more..went crazy over bike and did not even thought of my pyara cycle..when we get the new .we forget our dear old once.. same goes in real life too..after this thought i never asked dad for the bike..i still love my cycle and even though i dont use it.. i never sold it off.. its still with me..
26th oct.2000

कल आज और कल

काश कि हम बीते हुए कल को भूल जाते
और आने वाले कल की तलाश में कही दूर् निकल जाते
मगर न जाने क्यों इंसान बीते कल को भूल नही पाता है
आज की कौन कहे,बीता कल तो आने वाले कल को भी सताता है

फिर सोचता हू कि मैं बीते कल से क्यों इतना नाराज था
वही बीत हुआ कल भी तो कभी मेरा आज था
कल के कारण ये जो यादों का सैलाब छाया है
मै ये क्यो नही समझता किवो कल बीता
तभी तो जाकर ये आज आया है
और ये आज भी कहां सदा के लिए हीं आज रहने वाला है

बस कल होते हीं बीते कल के पैगाम् कहने वाला है
दुनिया ऐसे ही चलती है, ज़िंदगी ऐसे ही पलती है,
जीने का यही दस्तूर है
बीता कल अगर आने वाले कल को गुमराह कर दे तो
इसमे कल का क्या कसूर है

वो कल भी तो हमने ही जिया था,
अम्र्त या ज़हर जो भी पिया वो हमने ही पिया था
गलतियां करते है खुद,दोश अपने कल को देते हैं
औरों की क्या कहें हम तो इन्सानियत के वो नमूने हैं
जो कल कसोटे तो
बीते कल क साथ छोङ् कर आने वाले कल के साथ हो लेते हैं

अक्स

4 सेपट 1999
अक्स

लाख समझाता हूं मन को,

क्यों करता है लोगों पर विश्वास
मन बावरा है
फिर भी लगा लेता है आस
तू जानता है कि,
जिन्हे तू अपना कहता है
वही तेरा सुकून छीनेंगे
और फिर एक दिन वो
तेरे ही आंखो के सामने
तेरे अरमानों का खून करेंगे
उठना भी चाहेगा अगर
तो उठने नही देंगे और
तेरे वजूद को वे
अपने पैरों की धूल करेंगे
तू चीखेगा, तू चिल्लाएगा
मगर उनके कानों मे जूं तक नही रेंगेगी
इधर तेरे अरमानों की लाश निकलेगी
उधर उनकी रंगीन महफिलें सजेंगी
तुझे सुनने वाला कोइ नही होगा
पर सुनाने वाले हज़ार होंगे
पार ले जाने को एक भी लहर न होगी
पर डुबोने को मौजों के धार होंगे
तू सोच रहा होगा कि
जहां सभी हो चले बेगाने,
ये कौन है न जाने,
तू जानता है मैं कौन सख्स हुं
मैं और कोइ नही,
मैं तो तेरा अक्स हूं,मैं तो तेरा अक्स हूं,मैं तो तेरा अक्स हूं

प्रियंका

6th aug.1998
Inspiration:For my lovin sis who wanted me to write something on her name..


उम्मीद लगाए बैठा हूं फिर भी है मन में शंका
क्या मुझे मिल जएगी मेरी प्रियंका...

सारंग के सुर हों या धुन हो म्रिदंग का
छू जाते हैं दिल को,हर लेते हैं मन को
हो जाते हैं वो प्रिये, कहलाते हैं प्रियंका....

सागर रुपि प्रिये से मिलने,बन जाने गहना उनके तन का
टोङ देते है हर दीवार को,चाहे हो पथ्थर या हो वेग पवन का
मिल जाते है प्रिये से,कहलाते है प्रियंका......

भंवरे पुष्प् रस पीने को व्याकुल, हो हर्शित कण कण मन का
सर्प चंदन से लिपटने को आतुर,हो पुलकित रोम बदन का
मिल जाते हैं प्रिये से,कहलाते हैं प्रियंका....

हर कोइ अपने जीवन में, बन जाए साथी किसी के जीवन का
उम्मीद लगाए बैठा हूं, फिर भी है मन में शंका
क्या मुझे मिल जाएगी , मेरी प्रियंका...........

Friday, February 03, 2006

अश्क


8 अग्स्त् 1997
अश्क

Inspiration- a drop fell from my eyes pleading for its existence.

just an attempt to full fill the desire of his pious soul

marne wali ki antim ikcha puri kar deni chahiye...



कभी नयनों के मोती बन भिगो जाते हैं अश्क
तो कभी दिल के तारों को झकझोर जाते है अश्क
अक्सर मन मे छुपे दर्द् बन कर झलक् जाते है अश्क
तो कभी कभी अकल्पित खुशियों को भी दर्शाते है अश्क

कभी विरह की दुखांत बेला में भर आते हैं अश्क
तो कभी मिलन में विभोर नेत्रों से छलक जाते हैं अश्क
कभी बिना बोले सारी बातें कह् जाते हैं अश्क
तो कहीं सारे गिले शिकवों को छुपा जाते हैं अश्क

बङे अनमोल हैं,संभालने योग्य हैं,बेमोल हैं अश्क़
लेकिन क्या करें लाख सम्भालें,इन आंखों से छलक जाते हैं अश्क

WE

In the ocean of hope
I have drowned my soul.
I want you in my life
that's my only goal.
The ways may be different
The days may be different.
So different is the world that
for each other,
our craze may be different.
But i think one thing about you
and you know one thing about me
that has to be written in our life
when me and u will be 'WE'.
WE, flowin the breeze so high
WE, want to touch azure sky
WE, a mirror of reflection for our feelings
WE, for each,try to save up things.
WE, the horizon of our home
WE, this is the way we ve grown.
WE, give completeness to our soul
WE, be together whether run or stroll.
WE, a name for me, a name for u
WE, a visualization of our dreams come true.
WE, a passion to be one,though we r two
WE,which has only ME and only YOU.

आंखे


लोग कहते है,आंखें देखती हैं,
मुझे तो ये आखे दिखाती हैं
रोशनी से धुले चांद के पीछे छुपा मेरा सपना
उमडती लहरों के छीटों से मुझे बुलाता कोइ मेरा अपना

लोग कहते है,आखे देखती हैं,
मुझे तो ये आखे सुनाती हैं
कभी मुझे अचानक देख उन सासों का उमडना बार बार
तो कभी शरम से झुके चेहरे से थिरकटे होंठो के तार

लोग कहते है,आखें देखती है,
मुझे तो ये आखें बताती है
कि तुम्हारी नस नस मे लहू बन के मै ही मै बहता हू
और तुम्हारी आखों मे सपना बन के मै रहता हू

लोग कहते है,आखें देखती है,
मुझे तो ये आखें समझाती हैं
किसी के चेहरे मे नही,उसकी आंखो मे चेहरे के नूर है
ज़ुबां बंद हो फिर भी आंखे सब बोल दे
तो भला इनमें इन आंखो का क्या कसूर है??????
बोलोः-(!!!