Saturday, February 04, 2006

अक्स

4 सेपट 1999
अक्स

लाख समझाता हूं मन को,

क्यों करता है लोगों पर विश्वास
मन बावरा है
फिर भी लगा लेता है आस
तू जानता है कि,
जिन्हे तू अपना कहता है
वही तेरा सुकून छीनेंगे
और फिर एक दिन वो
तेरे ही आंखो के सामने
तेरे अरमानों का खून करेंगे
उठना भी चाहेगा अगर
तो उठने नही देंगे और
तेरे वजूद को वे
अपने पैरों की धूल करेंगे
तू चीखेगा, तू चिल्लाएगा
मगर उनके कानों मे जूं तक नही रेंगेगी
इधर तेरे अरमानों की लाश निकलेगी
उधर उनकी रंगीन महफिलें सजेंगी
तुझे सुनने वाला कोइ नही होगा
पर सुनाने वाले हज़ार होंगे
पार ले जाने को एक भी लहर न होगी
पर डुबोने को मौजों के धार होंगे
तू सोच रहा होगा कि
जहां सभी हो चले बेगाने,
ये कौन है न जाने,
तू जानता है मैं कौन सख्स हुं
मैं और कोइ नही,
मैं तो तेरा अक्स हूं,मैं तो तेरा अक्स हूं,मैं तो तेरा अक्स हूं

3 Comments:

Blogger Voice said...

AKS ko main janta hu...bahut jhoot bolta hai..biswas mat kia kar uspe jyada.

again a good poem be

11:13 AM  
Anonymous Anonymous said...

tumhara aks main hun n u said main buri nahi thn u can trust me na!

4:23 PM  
Anonymous Anonymous said...

best regards, nice info 1977 jeep cj5 Kitchen chick volvo aq 110 parts Hormonal hair loss treatment Porsche 997 dealers Rejuvi tattoo removal ellicott city 1998 honda accord maintenance schedule Lima tv prozac weight loss or gain volvo wheel and rim Hard water and dishwashers Cappuchino wood finish furniture

6:20 PM  

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